Kabir ke dohe

जहां दया तहं धर्म है, जहां लोभ तहं पाप।
जहां क्रोध तहं काल है, जहां क्षमा आप॥

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछू न चाहिए, सोई साहंसाह॥

हीरा पड़ा बाज़ार में, रहा छार लपटाय।
बहुतक मूरख चलि गए, पारख लिया उठाय॥

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिल्य कोए।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोए॥

चलती चाकी देख के, दिया कबीरा रोई।
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोई॥

माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि ईवै पडंत।
कहै कबीर गुरु ज्ञान ते, एक आध उबरंत॥

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।

सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में करते याद ।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥

सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥

पाहन पूछे हरि मिले तो मैं पूजूँ पहार ।
ताते यह चाकी भली पीस खाय संसार।।

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥

तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय ।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह ।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥

उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास।
तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥

कंकर पत्थर जोरि के मस्जिद लयी बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय।
आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥

साँई इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय ।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भुखा जाय॥

सॉंच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदै सॉंच है, ताके हिरदै आप।।

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान।।

दोस पराए देखि करि, चला हसंत हसंत।
अपने या न आवई, जिनका आदि न अंत।।

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रूचै, सीस देइ ले जाय।।

पाहन पुजे तो हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़।
ताते या चाकी भली, पीस खाए संसार।।

जिन ढूँढा तिन पाइयॉं, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।।

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि।
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।।

सोना, सज्‍जन, साधुजन, टूटि जुरै सौ बार।
दुर्जन कुंभ-कुम्‍हार के, एकै धका दरार।।

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।

काल्‍ह करै सो आज कर, आज करै सो अब्‍ब।
पल में परलै होयगी, बहुरि करैगो कब्‍ब।

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय।
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
प्रेम गली अति सॉंकरी, तामें दो न समाहिं।।

Kabir in Gurbani

“Kabeer garab na keejiye, rank na hasiye koe,
Aja hu naao samund mein, kya jana kya hoye”
{ O Kabeer, don’t ever be proud or laugh at other’s misery,
Your boat is still in the world-ocean, who knows what may happen with you?}

“Kabeer aisa ko nahi, mandar de-e jarae,
Pancho larke maarke, rahe Raam lio lae”
{ O Kabeer, is there anyone who can burn his own house (‘mind’),
kill his five sons (lust, ire,avarice,attachment,ego) to remain lovingly attached to the Lord?)

“Kabeer charan kamal ki mouj ko, keh kese unmaan,
Kehbe ko sobha nahin dekhat hi parvaan”
{ O Kabeer, the ecstatic enjoyment of the Divine (enlightenment) is ineffable.
Describing it in words is doing injustice to it, it’s splendor is only to be self-experienced}

“Kabeer meri jaat ko, sabko hasne haar,
Balhari is jaat ko, jeh japyo sirjanhaar”
{ O Kabeer, everyone laughs at my social caste,
but, I am a sacrifice to it, as I got to meditate on the Creator in it.}

Chadariya jheeni re jheeni

chadariya jheeni re jheeni, raam naam ras bheeni;

The fabric (body) is subtle, very subtle, indeed; it is woven with the essence of God’s name;

asht kamal ka charkha banaya, panch tatwa ki pooni;

The eight lotuses (chakras) made the spinning wheel which spun the five elements (earth, water, fire, air, ether) to make the fabric;

nau das mas bunan ko lage, murakh maili keeni.

It took nine months (ten lunar months) for its weaving, and foolish people defile it;

jab mori chadar ban ghar ai, rangrez ko deeni;

Once the fabric was made and brought home, it was given to the dyer (guru) for colouring;

aisa rang ranga rangrez ne, lalo laal kar deeni.

The dyer coloured it with such skill that it became brilliantly red (illumined);

chadar ode sanka mat kariye, ye do din tumko deeni;

As you wear this fabric, do not have doubts; it is a gift to you for two days only;

murakh log bhed nahi jaane, din din maili keeni.

Foolish people do not know the secret of this fabric, and day after day they pollute it;

dhruv prahalad sudama ne odhi, shukdev ne nirmal keeni;

Dhruv, Prahalad, Sudama and Shukdev wore this fabric and purified it;

das kabir ne aisi odhi, jyon ki tyon dhari deeni.

The servant Kabir wore it in such a way, that he returned it in the condition in which he received it.

Lyrics : Ae Malik Tere Bande Hum

ऐ मालिक तेरे बन्दे हम – Ae Malik Tere Bande Hum
Movie/Album: दो आँखें बारह हाथ (1957)
Music By: वसंत देसाई
Lyrics By: भरत व्यास

ऐ मालिक तेरे बन्दे हम
ऐसे हों हमारे करम
नेकी पर चलें और बदी से टलें,
ताकि हंसते हुए निकले दम

बड़ा कमज़ोर है आदमी, अभी लाखों हैं इसमें कमी
पर तू जो खड़ा, है दयालू बड़ा
तेरी किरपा से धरती थमी

दिया तूने हमें जब जनम
तू ही झेलेगा हम सबके ग़म

नेकी पर चलें और बदी से टलें,
ताकि हंसते हुए निकले दम

 

ये अंधेरा घना छा रहा, तेरा इंसान घबरा रहा
हो रहा बेखबर, कुछ न आता नज़र
सुख का सूरज छुपा जा रहा

है तेरी रोशनी में जो दम
तो अमावस को कर दे पूनम

नेकी पर चलें और बदी से टलें,
ताकि हंसते हुए निकले दम

जब ज़ुल्मों का हो सामना, तब तू ही हमें थामना
वो बुराई करें, हम भलाई भरें
नहीं बदले की हो कामना

बढ़ उठे प्यार का हर कदम
और मिटे बैर का ये भरम

नेकी पर चलें और बदी से टलें,
ताकि हंसते हुए निकले दम